KavitaPremiumरो लो पुरुषो , जी भर के रो लो
बड़ा कमज़ोर होता है बुक्का फाड़कर रोता हुआ आदमी
7 Feb, 20161 min read
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Poetry.
KavitaPremiumबड़ा कमज़ोर होता है बुक्का फाड़कर रोता हुआ आदमी
आज सवेरे जब तुम्हे देख रही थी अपलक , परिंदों को दाना डालते हुए ,
कमला के आदमी ने कमला के गाल सुजाये खींचा पटका और घर से निकाल दिया
सबसे उदास और बदरंग मौसमों में मैंने चुने सबसे चटक रंग अपनी कुर्ती के लिए
बारिश का होना केवल काले बादलों से बूंदों का गिरना थोड़े ही है
जब भी देखो किसी चिड़िया को चहकते, फुदकते बस उसी को देखना एकटक