और फिर पप्पू कवि बन गए ...
पप्पू जब बेरोजगारी से उकता गया तो उसने नाना प्रकार के कामों में हाथ डालना चाहा
पप्पू जब बेरोजगारी से उकता गया तो उसने नाना प्रकार के कामों में हाथ डालना चाहा मगर पप्पू को देखते ही समस्त कार्य स्वयं पतली गली से निकल भागते थे।
ऐसा कोई काम जिसमे न तो मेहनत लगे और न दिमाग पप्पू के दिमाग ने अपनी टूटी टांग से खलबलाना शुरू किया और पप्पू ने जगह जगह ऐसे कार्य की तलाश शुरू कर दी।
पप्पू कविता रचने को तप कर्म से कम नहीं समझता था। पूर्ण विधि विधान से कविता करने बैठता था। सबसे पहले पादुकाएं दरवाजे पर उतारता था, पादुकाओं के समीप ही दिमाग भी उतारकर रख देता था।
पप्पू कविताओं की समीक्षा करने लग गया। पप्पू ने एक महान कार्य और कर दिया था जिसके लिए सदियाँ सदियों तक उसका यशोगान करा करेंगी। पप्पू ने रोजगार के लिए बुद्धि और परिश्रम पर निर्भरता का अंत किया था।
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