एक पुरानी ग़ज़ल
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जब से तकदीर कुछ खफा सी है जीस्त भी मिलती है गैरों की तरह
जब से तकदीर कुछ खफा सी है
जीस्त भी मिलती है गैरों की तरह
शब के साथ ही गुम होते हैं
वफ़ा करते हैं वो सायों की तरह
बेताब तमन्नाओं को हकीकत से क्या
उड़ती फिरती हैं परिंदों की तरह
कहकहे लुटाता है सरे महफ़िल
तनहा रोता है दीवानों की तरह
बंद कमरे बताएँगे हकीकत उनकी
जो हैं दुनिया में फरिश्तों की तरह
पल में ग़म भूल खिलखिलाते हैं
खुदा,कर दो मुझे बच्चों की तरह
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