कोई ... इंतज़ार, पतझर और इश्क
वो पतझर के मौसम का बेसब्री से इंतज़ार करने वाली एक अजीब किस्म की लड़की थी!
वो पतझर के मौसम का बेसब्री से इंतज़ार करने वाली एक अजीब किस्म की लड़की थी!
ऐसे मौसम में जब चारों ओर पीले पीले पत्ते हवा में उड़ते हुए ज़मीन पर आ गिरते, वह किसी गुलमोहर के नीचे किसी बेंच पर बैठ जाती और निचला होंठ दांतों से दबाये पत्तों का शोर सुनती रहती!
उसे इस सन्नाटे भरे शोर में कुछ बोझिल आवाजें सुनाई देतीं!
जैसे पत्ते अपनी शाखों से विदा लेते हुए धीमे धीमे सिसकियाँ ले रहे हों!
उसे पूरा पतझर विदाई का मौसम महसूस होता था!
ऐसे में उसे "कोई" बहुत याद आता!
उसके कानों में पिछला वक्त रेंगता हुआ पूरे शरीर में दौड़ने लगता!
वह अपनी रगों में "कोई" को महसूस करती हुई बर्फ की तरह जम जाती!
आँखों में सर्द और जमे आंसुओं की किरचें चुभतीं!
जब अँधेरा घिरने लगता तो वह किसी एक टूटे पत्ते को उठाकर घर ले आती!
उसे लगता मानो अपने दरख़्त से अभी अभी जुदा हुए पत्ते को किसी के साथ की ज़रुरत है!
वह खामोश रातों में अक्सर एक आवाज़ सुनकर उठ जाती...
अपने सीने के बायीं ओर हाथ रखने पर उसे अपनी धड़कन की लय के साथ एक और धड़कन सुनाई पड़ती!
वह समझ जाती, ये "कोई" धड़क रहा है!
वह मुट्ठी में अपने दिल को भर लेती... "कोई" कहीं नहीं था!
मगर "कोई" हर जगह था!
एक दिन पतझर के मौसम में अचानक तब्दीली आई!
अचानक पत्तों का टूटना और गिरना बंद हो गया!
हवा सुहानी हो गयी!
उसने हैरत से नज़रें उठाईं.... वो आँखें मलकर बार बार देखती!
उसकी आँखों के सामने "कोई" खड़ा था!
उसने उस दिन एक और गुलाबी गर्दन और पीली आँखें देखीं!
उसके इंतज़ार का पतझर बीत चुका था और इश्क के दरख़्त पर कई रंगों वाले फूल खिल आये थे!
दो पल बाद वो "कोई" की बाहों में थी!
आसमान की आँखें भर आयीं और सामने पहाड़ की चोटी पर बरसों से जमी सफेदी पिघलकर बह निकली!
वक्त गुज़रना भूलकर इस मिलन का गवाह बन गया था!
अब दोनों का बदन गुलाबी रंग का दिखाई देता था!
और उनके क़दमों के नीचे से पीली नदी बह निकली थी!
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