माँ होने के वो दस मिनिट
अक्सर एक छुट्टू सी हंसी नाभि से बाहर को फुदकती आती है और हम दोनों के होंठों पर नाचने लगती है!
अक्सर एक छुट्टू सी हंसी नाभि से बाहर को फुदकती आती है और हम दोनों के होंठों पर नाचने लगती है!
कभी कभी इक कोमल अंगूठा मेरी दीवारें खटखटाता है और मैं मुस्कुराकर बुदबुदाती हूँ "थोडा रुको अभी..और थोड़े बड़े हो जाओ"
जब रातों को मेरा सारा बदन सोता है तो मेरी रूह जागकर एक नन्हे बदन की रखवाली करती है!
मेरे सीने के बाईं ओर की टिकटिक मुझे अब सुनाई नहीं पड़ती... मेरी सम्पूर्ण देह ही एक ह्रदय में तब्दील हो चुकी है!
मैं मेरी माँ को याद कराती हूँ "माँ याद करो ना, क्या तुम्हे भी ऐसा होता था?"
माँ ज़ोरों से हंसती है, माँ की स्मृति से एक पल को भी मेरा आना विस्मृत नहीं हुआ है, माँ को उस एहसास को जीने के लिए बस मुझे बाहों में भर लेना होता है!
ओह... पूरा ब्रम्हांड मेरे अन्दर गोल गोल चक्कर काटता है!
मेरे स्वप्न तुतलाने लगे हैं, मैं दुनिया का सारा ज्ञान परे रख नन्ही ठोकरों की भाषा सीखने लगी हूँ!
मेरी देह के ताल में एक गुलाबी कमल खिल रहा है!
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