छत पे आ जाते थे कपड़ों का बहाना करके
अस्सी का दशक, दो आमने-सामने की छतें, दीवाली की मिठाई की थाली पर पहली छुअन — और कभी पूरी न हो सकी एक नज़री प्रेमकथा। याद है आज भी, खामोश मुस्कान बनकर।
" छत पे आ जाते थे कपड़ों का बहाना करके
क्या मोहब्बत के थे जज़्बात ज़रा याद करो 😍 "
वह अस्सी का दशक था। लड़का बारहवीं में पढ़ता था और लड़की ग्यारहवीं में।
उस वक्त मोहल्लों में प्यार की जाने कितनी सारी कहानियां घर की छतों से शुरू हुआ करती थीं।
ढाई फीट की एक छोटी-सी बाउंड्री वॉल से जुड़ी हुई छतें, आठ फीट की रोड के दोनों ओर टंगी छतें, सुबह-शाम की ताज़ा ठंडी हवा में इश्क से महकती छतें, सर्दियों की दोपहरी में किताबों के पीछे से आँखों-आँखों में बातें करती छतें, गर्मियों की रातों में साफ़ आसमान में सितारों के नीचे छुप-छुप कर एक दूसरे को ताकती छतें — पतंगों के साथ दिल के भी पेंच लड़ाती छतें।
आज मोबाइल और इन्टरनेट के युग में मुहब्बतें आसान हो गयी हैं। लेकिन अस्सी के दौर में छतों की मुहब्बतों में आसानी भले न थी, रोमांच भरपूर था। ये वो दौर था जब बातें करना, मिलना इतना आसान न हुआ करता था। एक मुलाक़ात के पहले महीनों निगाहें आपस में बात किया करती थीं।
" मम्मी! पढ़ने जा रहे हैं छत पर " — शाम होते ही सभी घरों के बच्चे सज-धज कर छत पर पहुँच जाते। मम्मी भी प्रसन्न होतीं कि " कितनी चिंता है पढाई की, टोकना नहीं पड़ता! "
लडकियां रोज़ नए फैशन के कपडे पहन कर छत पर जाया करतीं... लड़के भी टिप-टॉप रहने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हाथ में पानी की बोतल, कभी-कभी कांच के गिलास में रूह आफ्ज़ा भी छत पर घूम-घूम कर ही पिया जाता। किताब भी एक अतिरिक्त बोझ की तरह हाथ में झूलती रहती। जिनको बगल वाली या सामने वाली छत पर जीने की वजह मिल जाती वे अँधेरा होने तक एक दूसरे को बस बिन कुछ कहे निहारा करते।
जिनके नसीब में थोड़ा और इंतज़ार बदा होता वे छतों पर घट रहीं प्रेमकथाओं को सिलसिलेवार अपनी मेमोरी में दर्ज करते जाते जिससे अगले दिन दोस्तों पर अपनी किस्सागोई के झंडे गाढ़ सकें।
यूं आधे लोग इश्क फरमाते... आधे आशिकों के मज़े लेते। कुल मिलाकर किताबें उसी पेज पर हवा खाकर वापस लौट आती।
अँधेरा होते ही नीचे से मम्मी की आवाज़ आने लगती — " चलो, नीचे आओ, नीचे बैठकर पढो "
" हाँ मम्मी, आते हैं, अभी तो दिख रहा है "
और सच भी है, दूसरी छत का सब कुछ दिख रहा होता था।
गोली मारो किताब में लिखे को... कमबख्त कोर्स की किताब को कौन पूछे जब सामने मुहब्बत की किताब खुली हो! मुहब्बत की किताब का यही फायदा है — इसके अक्षर पढ़ने के लिए उजाले का होना नितांत ग़ैर-ज़रूरी है।
तो लड़का, लड़की की छत आमने-सामने थीं। लड़की किसी और शहर में रहती थी लेकिन उसके पिता का ट्रांसफर आसाम के किसी शहर में हो जाने से वह अपने चाचा के घर पढ़ने आ गई थी। यह छत लड़की के चाचा की थी जिसकी जमीन पर प्रेम का फूल खिलना तय हुआ था। दोनों की निगाहें भी एक रोज़ छत पर टहलते-टहलते टकरा गईं और बस कर्रा एक्सीडेंट हो गया।
अब लड़की रोज़ सुबह धुले कपड़े फैलाने छत पर जाती, उसी वक्त लड़का भी विटामिन डी के सेवन के लिए छत की मुंडेर पर बैठ जाता। उन्हीं दिनों नियमित रूप से सेकंड डिवीजन में पास होने वाले लड़के की पढ़ाई में गहरी रुचि जाग गई। जो लड़का मम्मी की चार गालियों के बगैर किताबों को हाथ लगाना गुनाह समझता था, अब कंघी-पट्टी करके रोज़ शाम छत पर किताब लेकर जाने लगा। न केवल पढ़ाई बल्कि छत को धोने, पौधों में पानी डालने और पापड़, बड़ी फैलाने जैसे कामों में भी लड़के की रुचि अचानक जाग गई थी।
शाम को उधर सूरज डूब रहा होता, इधर दो दिल इश्क में डूब रहे होते। लड़की पढ़ने में अच्छी थी और वह नज़रें मिलने से पहले से छत पर पढ़ाई कर रही थी।
अब तक दोनों की औपचारिक पहचान नहीं हुई थी और न कभी आपस में कोई बात हुई थी। दोनों की नज़रें लेकिन एक दूसरे की छत पर बे-रोकटोक जातीं और आपस में खूब बतियातीं। अब दोनों के बीच मुस्कुराहट का भी आदान-प्रदान होने लगा था और इधर-उधर देखकर कभी-कभी लड़का फ्लाइंग किस भी उछाल देता और उस दिन लड़की के चेहरे पर सूर्यास्त की लाली छा जाती। कभी लड़का पौधों में पानी देते हुए लड़की को गुलाब का फूल दिखा देता, कभी लड़की लड़के की ओर देखती हुई अपने पालतू कुत्ते को बाहों में भींच लिया करती।
ये छोटे-छोटे प्रेम संदेश थे जिन्हें सिर्फ वे दोनों डीकोड कर पाते। जब लड़की छत पर न होती तो सुरीला लड़का गाना गा उठता —
" तुझे चाँद के बहाने देखूँ, तू छत पर आ जा गोरिए "
यह तान सुनते ही लड़की जैसी बैठी होती, वैसी ही भागकर छत पर पहुँच जाती। बेसुरी लड़की को जब लड़के को पुकारना होता तो उसका बीपीएल सेन्यो का छोटा सा टेपरेकॉर्डर काम आता जिसमें विजेयता पंडित जंगल-जंगल भटकती हुई गा रही होती —
" याद आ रही है, तेरी याद आ रही है "
और अगले ही पल बस लड़का तीन-तीन सीढियां फलांगता हुआ छत पर नमूदार हो जाता।
लड़की की पहली मुलाकात लड़के से तब हुई जब वह दीवाली की मिठाई की क्रोशिये के रूमाल से ढकी थाली लेकर लड़के के घर देने पहुंची और इत्तेफाक से लड़के ने दरवाजा खोला और लड़की से थाली थामते हुए उंगलियों का उंगलियों से पहला स्पर्श हुआ।
दिल का धड़कना, गुझिया की महक से साँसों का महकना, हाथों का थरथराना — सब उस लम्हे में एक साथ हो गया। इतने में लड़के की माँ आ गई और यह मुख्तसर-सी मुलाकात खत्म हुई।
कयामत यह कि इस मुलाकात को आखिरी भी होना था। अगले कुछ महीने भी ऐसे ही छत पर इश्क करते बीते। फिर परीक्षा देने के बाद लड़की अपने घर चली गई और फिर नहीं लौटी। लड़के को जाने से पहले बता भी न पाई क्योंकि लड़का उन दिनों शहर से बाहर था। जब लौटा तब तक छत और मन दोनों सूने हो चुके थे। इसके बाद लड़की के चाचा भी शहर छोड़कर चले गये और एक प्रेम कथा दो छतों का राज़ बनकर रह गई।
लड़का, लड़की कई दिनों तक उदास रहे। फोन करने या खत लिखने की कोई सूरत नहीं बन पाई थी। पता, फोन नम्बर — कुछ भी तो नहीं था उनके पास। ना किसी से मांगने की हिम्मत।
फिर धीरे से वक्त की धूल प्रेम के उन लम्हों पर चढ़ती गई और अगले दो सालों में दोनों के दिल किन्हीं और प्रेमियों के लिए धड़कने लगे।
अस्सी के दौर वाले कितने ही प्रेमी आज एक साथ उन्हीं छतों पर बैठकर अपने बच्चों के साथ शाम की चाय इकठ्ठा पीते हैं, कितने ही उस पुराने मोहल्ले में उसी पुरानी छत पर कुछ वक्त गुज़ारने चले जाते हैं और सामने की ख़ाली छत को एक दबी हसरत से देख वापस लौट आते हैं, कितने ही अब छत वाली को अपने नन्हे के साथ देखकर 'मामा' शब्द से आतंकित होकर पीछे मुड़ जाते हैं और कितने ही उन छतों के किस्सों को फेसबुक पर लिख डालते हैं कि शायद उन सैकड़ों लाइक्स में उस सामने की छत वाले ख़ास नाम का एक लाइक झिलमिला जाए।
लड़का, लड़की उस कच्ची उम्र वाले इश्क से कब के बाहर निकल चुके हैं और अपनी-अपनी ज़िंदगियों में खुश हैँ। लड़के ने एक-दो बार लड़की को सोशल मीडिया पर ढूँढने की कोशिश की मगर वह उसे कभी नहीं मिली। लड़की ने कभी ढूँढने की कोशिश ही नहीं की।
दोनों अब एक दूसरे को ना प्यार करते और ना ही याद करते। एक दूसरे के लिए कोई हूक भी नहीं उठती — लेकिन जब-जब यारों-दोस्तों में पहले प्यार के किस्से सुनाए जाते हैं तब दोनों अपनी उसी छोटे शहर वाली छत पर 1985 के साल में पहुँच जाते हैं और मुस्कुराते हुए अपने नज़री इश्क की हसीन कहानी सुनाते हैं। ❤️
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