हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ
एक अप्रैल की ठंडी रात, छत पर बिछे दो बिस्तर, दो अजनबी लड़कियों के दो अजनबी दुःख — और एक नई दोस्ती जो रोते-रोते सुबह तक पक्की हो जाती है।
लड़की उस रोज़ एक नए शहर में काम से आयी थी और अपनी एक सहेली की दोस्त के घर रुकी थी। मेज़बान लड़की खुशमिजाज़ और मेहमान-नवाज़ थी। दोनों ने दिन भर खूब धींगामस्ती की। शाम को मूवी देखी और डिनर के बाद घर आकर दोनों सहेलियां अपने-अपने स्कूल के किस्से सुनाकर खूब हंसीं। दोनों बहुत खुश थीं। वो एक बहुत खूबसूरत मौसम वाला अप्रेल का दिन था। रात बहुत सुहानी और ठंडी थी। लड़की की सहेली ने बहुत पहले से छत पर बिस्तर डाल दिए थे।
रात एक बजे दोनों ऊपर छत पर सोने गईं। बिस्तर एकदम ठन्डे थे। दोनों ने थोड़ी देर और गप्पें मारीं फिर एक दूसरे को गुडनाइट कहा।
घण्टे भर बाद दोनों को एहसास हुआ कि दोनों में से कोई भी नहीं सोया है।
" नींद नहीं आ रही क्या " सहेली ने लड़की से पूछा।
" नहीं.. " लड़की की आवाज़ में छुपे रुआंसेपन को भांप सहेली चौंक गई।
" क्या हुआ, कुछ सोच रही है क्या "
" नहीं तो.. "
सहेली उठकर बैठ गयी। लड़की का चेहरा अपनी ओर घुमाया। ये क्या.. लड़की का चेहरा आंसुओं से भरा हुआ था। आँखें सूजकर फूल गयी थीं।
" क्या हुआ तुझे, तू रो रही इतनी देर से और सिसकी तक छुपा लीं अपनी। "
लड़की सहेली के गले से चिपक कर ज़ार-ज़ार रो पड़ी। रोते-रोते मरी-सी आवाज़ में बोली —
" आज उसकी शादी है.. अभी फेरे चल रहे होंगे शायद "
सहेली की आँखों में भी आंसू तैर आये। देर तक लड़की को कलेजे से चिपकाए रही। फिर लड़की के कानों में फुसफुसाई —
" मेरे वाले की शादी अगले महीने है "
लड़की ने सहेली को देखा और दोनों की रुलाई फूट पड़ी।
दो अजनबी दुःख रात भर एक साथ जागते रहे, अपने आप को एक दूसरे से बांटते रहे। सुख से ज्यादा करीब दुःख लाता है। एक दूसरे के लिए अजनबी लड़कियां दिन भर सुख साझा करते रहीं और दोस्त बन गईं, और रात भर दुःख साझा करते-करते पक्की दोस्त बन गईं।
दुःख और बादल एक जैसे ही होते हैं। जब तक बरसते नहीं, हल्के नहीं होते। रात भर बादल जम के बरसे और सुबह गुनगुनी धूप खिल आयी थी।
" बहुत बुरा है तेरा वाला, कभी शक्ल भी न देखूँ उसकी " सहेली सुबह छह बजे लड़की को छेड़ रही थी।
" वैसे इतना बुरा भी नहीं है "
लड़की का प्यार में डूबा मन अभी भी लड़के के लिए कुछ बुरा सुनने को तैयार नहीं था।
" ओहो.. क्या बात है मैडम जूलियट " सहेली ने चुटकी ली।
" चल, कॉफी पीते हैं। वैसे भी जो हमें अपनी ज़िंदगी के लिए नहीं चुनता, उसके लिए हम भी क्यों अपने कीमती आँसू बरबाद करें? ये आँसू भी उसके लिए बहाएंगे जो इन्हें डिज़र्व करेगा। "
लड़की की आवाज़ में एक ठसक उतर आई थी।
" यू आर राइट डियर। भाड़ में झोंकते हैं दोनों को और यह खूबसूरत सनराइज देखते हैं जो इन्हीं कम्बख्तों की वजह से नसीब हुआ है। वैसे दोनों को एक शुक्रिया भी बनता ही है। "
" शुक्रिया किस बात का? "
" इन्हीं की वजह से आज हम दोस्त जो बने हैं। "
थोड़ी देर पहले आँसुओं में डूबी दोनों लड़कियों की हंसी पके गेहूँ के दानों-सी छनछनाती छत पर बिखर गई।
अगले दिन लड़की अपने घर लौट गई — अगले महीने की किसी ख़ास तारीख को आने का वादा करके। ❤️
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