कितने दिन लगते हैं भुलाते, देख रहा हूँ
एक सर्द आधी रात, एक खुली डायरी का सबसे उदास पन्ना, और जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल। दस बरस बीत गए — और लड़की डायरी के उसी पन्ने के नीचे एक और उदास पंक्ति दर्ज करती है।
एक सर्द मौसम की आधी रात की तन्हाई है और लड़की जाग रही है। नींद आँखों से कोसों दूर है। लड़की के हाथ में है एक डायरी आधी खुली हुई। डायरी का एक ख़ास पेज खुला हुआ है जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी हुई है, डायरी की सबसे उदास पंक्ति —
" तुम कल चले जाओगे... "
झींगुर की तान उस रात की खामोशी में लगातार किसी कोरस की तरह बज रही है। बीच बीच में कोई टिटहरी चीखती हुई गुज़र जाती है तो नीरवता की शांत स्थिर नदी में एक लहर सी उठती है और फिर शान्ति छा जाती है। लड़की डायरी की पंक्ति के सहारे अतीत में उतर गयी है। अब उसने मोबाइल पर एक ग़ज़ल लगाई है — जगजीत सिंह की उदास आवाज़ है, डायरी का खुला पन्ना है और कहीं बहुत पीछे वक्त में तैरती लड़की।
" तुम बैठे हो लेकिन जाते देख रहा हूँ
मैं तन्हाई के दिन आते देख रहा हूँ
आने वाले लम्हे से दिल सहमा है
तुम को भी डरते घबराते देख रहा हूँ
कब यादों के ज़ख्म भरें, कब दाग़ मिटें
कितने दिन लगते हैं भुलाते देख रहा हूँ
उसकी आँखों में भी काजल फैला है
खुद भी मुड़के जाते जाते देख रहा हूँ "
जावेद अख़्तर की इस ग़ज़ल को आज भी जब जगजीत सिंह देर रात के उनींदेपन में गाते हैं तो इसे सुनते हुए लड़की का दिल यूं तेज़-तेज़ धड़कता है मानो बरसों पहले बिछड़े यार की गली से गुज़र रहे हों। विदा के ठीक पहले दो रुंधे कण्ठों में अटकी रुलाई है ये ग़ज़ल। उदासी के कैनवास पर एक धूसर पेंटिंग है जिसके रंग हमेशा गीले रहते हैं। हज़ार-हज़ार लफ़्ज़ों में बुना एक घबराया हुआ सन्नाटा है।
कोई हमेशा के लिए जा रहा था। आखिरी शाम दोनों एक साथ बैठे थे और यही ग़ज़ल एक छोटे से टेप पर बज रही थी। विदा के वक्त शब्द चुक जाते हैं। कहने को कितना कुछ है, कैसे कह पायेंगे चन्द घंटों में! बस साथ रह लें, हाथों को इतना कस के पकड़ लें कि ये छुअन जीवन भर न बिसराए, एक दूसरे को कंठ से लगा लें कि फिर जाने दो दिल इतना करीब कभी धडकें या नहीं। बातों में कौन इस तेज़ी से हाथों से छूटते वक्त को जाया करे! लड़का लड़की एकदम चुप थे। जो कुछ भी कहा सुना जाना था, जग्गू दादा कह रहे थे।
दो बंधे हुए हाथ थे, खामोश सूखे-सूखे लब थे, आंसू भरी आँखें थीं और आगे आने वाले लम्बी दोपहरों से सूने खाली बरस थे। वक्त का यह छोटा सा वक्फा मानो जिंदगी था और विरह मृत्यु जो उन दोनों को अपने आगोश में लिए जाने को बढ़ी चली आती थी।
वक्त को बीतना ही था, वह बीत रहा था अपने हर पल को कभी न भूल सकने वाली स्मृति में तब्दील करते हुए। प्रेम में बिताया कोई भी लम्हा कब बीतता है भला? अगर वह बीत गया होता तो आधी रात को नींदों में आने वाली हिचकियों, किसी बारिश के मौसम में दिल से तड़पकर उठती हूक, किसी कविता को पढ़ते हुए आँखों में झिलमिला जाने वाले अश्रु और किसी किताब को पलटते हुए उसमे से गिरे चॉकलेट के खाली रैपर को देखते हुए आने वाली सबसे उदास मुस्कानों में कैसे बरामद होता?
तो उस आखिरी शाम के ठीक एक रात पहले ही डायरी के उस पेज पर उस डायरी की सबसे उदास पंक्ति दर्ज हुई थी —
" तुम कल चले जाओगे.... "
जिसको जाना था वो तो कब का चला गया मगर बस जा ही नहीं पाया। यूं आज उस पल को बीते कोई दस बरस ही हुए इस महीने। लड़की ने आज कांपते हाथों से डायरी के उसी पेज पर उस पंक्ति के नीचे उससे भी उदास पंक्ति दर्ज की —
" तुम चले क्यों नहीं जाते....? " 😥❤️
Related writings
Comments
No comments yet.