मुस्कानों का मौसम
एक एस.टी.डी. बूथ, एक रोज़ शाम सात बजे आने वाली पुलिस की वर्दी वाली लड़की, और एक नौजवान की चुपचाप मांगी हुई दुआ — दस साल बाद कोतवाली में कुबूल हुई।
वे मोबाइल के प्रचलन में आने के शुरूआती दिन थे। आउट गोइंग कॉल के छह रूपये एक मिनिट के और इनकमिंग कॉल का एक रुपया चार्ज होता था। एस.टी.डी. की दरें इससे कुछ सस्ती हुआ करती थीं।
एक छोटे से शहर के एक एस.टी.डी. बूथ पर रोज़ एक लड़की शाम के ठीक सात बजे आया करती थी। दिनभर की दौड़-भाग से थकी हुई, क्लांत और उदास चेहरे वाली लड़की पुलिस की वर्दी में होती जिस पर नेमप्लेट नहीं होती थी लेकिन कंधे के दो स्टार बताते थे कि वह सब-इंस्पेक्टर है।
लड़की अपनी सरकारी जीप खुद ड्राइव करती हुई आती और लगभग पन्द्रह से बीस मिनिट एक नम्बर पर फोन करती। बूथ के अंदर एक छोटा सा ग्लास का केबिन बना हुआ था जिसे वह अंदर से चिटकनी लगाकर बंद कर लिया करती और लगभग फुसफुसाते हुए बड़ी धीमी आवाज़ में बात करती।
कोई नहीं जान पाता कि वो रोज़ किससे बातें करती है सिवाय उस एस.टी.डी. के मालिक के जो लगभग तेईस-चौबीस साल का नौजवान था। पारदर्शी केबिन के बाहर से लड़की की आवाज़ सुनाई न देती लेकिन लड़के की ओर पीठ किये बात करती लड़की के लगातार बहते आंसू और भिंची हुई सिसकियों से कांपते कंधे उससे न छुप पाते।
लड़की उससे और अपनी बारी का इंतज़ार करते केबिन के बाहर खड़े अन्य ग्राहकों से अपने आंसू छिपाने का भरसक प्रयास करती और झेंपती हुई बाहर निकलती और सीधे काउंटर पर पैसे देने आकर खड़ी हो जाती और पैसे चुकाकर सीधे अपनी जीप स्टार्ट कर चली जाती।
लगभग पन्द्रह दिन लगातार फोन करते रहने के बाद लड़की जब सोलहवें दिन एस.टी.डी. बूथ पर आई थी तो उस कांच के केबिन में तीनों तरफ एक मोटा नीला पर्दा लगा हुआ था।
लड़की ने उस दिन फोन करते हुए अपने आंसू बहने दिए थे। फोन रखकर रूमाल से ठीक से चेहरा पोंछा था और बाहर निकल आई थी। पैसे चुकाते वक्त उसकी आँखों में एक भीगा हुआ शुक्रिया था।
एस.टी.डी. वाला नौजवान अपने इश्क़ के अश्कों वाले मौसमों को याद करता हुआ मन ही मन दुआ मांग रहा था —
" हे ईश्वर... इस लडकी के आंसू जल्द बीतें और इसके होंठों पर मुस्कानों का मौसम आये "
चार महीने तक यह सिलसिला चलता रहा था फिर अचानक एक दिन लड़की ने आना बंद कर दिया। शायद उसका ट्रांसफर हो गया था। एस.टी.डी. वाले नौजवान ने कुछ दिन उसका इंतज़ार किया था फिर अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गया था।
ठीक दस साल बाद उस नौजवान के पास कोतवाली से एक कॉल आया था। उसे थाने बुलाया गया था। वह थोड़ा घबराया हुआ सा तुरंत उठकर थाने चल दिया था। टी आई के चेंबर में उसे बैठाया गया था।
मामले को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी टी आई साहब ने कमरे में प्रवेश किया और उससे हाथ मिलाया।
" आज सुबह ही कोतवाली में ज्वाइन किया और सबसे पहले तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चाहता था " कहते हुए उन्होंने चाय लाने का ऑर्डर दिया। चुस्त वर्दी में सौम्य व्यक्तित्व के टी आई साहब मुस्कुराकर उससे मुखातिब थे।
" लेकिन मुझे किस बात का शुक्रिया....? " वह अभी भी अचकचाया हुआ था।
" शायद अब तुम समझ जाओ कि किस बात का शुक्रिया " पीछे से आती एक मीठी आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा।
वही दस साल पहले की दुबली पतली उदास लड़की इंस्पेक्टर की वर्दी में दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। बदन थोड़ा भरा हुआ, चेहरा ख़ुशी और अच्छी सेहत से दमकता हुआ। वर्दी पर तीन स्टार और नेमप्लेट पर नाम — " मंदिरा मेहरा "
" इनसे मिलो... ये मेरी उत्तमार्ध " टी आई साहब ने लड़की के कंधे थामते हुए परिचय कराया।
" मुझसे ही बात किया करती थीं ये तुम्हारी एस.टी.डी. से! बहुत कम लोग आंसुओं की निजता को समझते हैं और तुम उन चन्द लोगों में से एक हो जो मन के सबसे कच्चे कोने को सार्वजनिक होने की लज्जा से बचाना जानते हो। हम दोनों तुम्हारे कृतज्ञ हैं। "
तीनों ने साथ चाय पी थी और देर तक बातें कीं थीं। उस लड़के की दुआ क़ुबूल हुई थी।
मुस्कानों का मौसम बाहर प्रांगण में लगे अमलतास के पेड़ पर पीले झुमके बनकर मुस्कुरा रहा था। ❤️
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